14 सितंबर 2011

" राजभाषा हिंदी: हमारे गौरव की प्रतीक " " हिन्दी दिवस पर हिन्दी "." राष्ट्रभाषा हिंदी को बांटने का कुचक्र " (14 सितम्बर)

" राजभाषा हिंदी: हमारे गौरव की प्रतीक " " हिन्दी दिवस पर हिन्दी "." राष्ट्रभाषा हिंदी को बांटने का कुचक्र " (14 सितम्बर)


आज हमारी मातृभाषा भारत की राजभाषा हिन्दी का दिवस है , आईये हम सब अपनी इस गौरवशाली राजभाषा और मातृभाषा को विश्व सिंहासन पर आसीन करने का प्रण लें, भारत के माथे के बिंदी हिन्दी में ही केवल यह खासियत है कि वह विश्‍व की हर भाषा के शब्दों को खुद में समेट कर विकसित हुयी है, हर भाषा की मिश्रित भाषा हिन्दी है, समूचे राष्ट्र ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को एकसूत्र में जोड़ने की क्षमता से परिपूर्ण दिलों को दिलों से जोड़ने में समृद्ध हिंदी को हम दिल से नमन करें


सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राद्ध का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी डालते हैं। इस मौसम में कवियों, लेखकों व साहित्यकारों को मंच मिलते हैं और कुछ को लिफाफे भी। इसलिए सब इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं और अपने हिस्से का कर्मकांड पूरा कर फिर साल भर के लिए सो जाते हैं।
पर हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) के कर्मकांड के साथ ही कुछ विषयों पर चिंतन भी आवश्यक है। देश में प्रायः भाषा और बोली को लेकर बहस चलती रहती है। कुछ विद्वानों का मत है कि भोजपुरी, बंुदेलखंडी, मैथिली, बज्जिका, मगही, अंगिका, संथाली, अवधी, ब्रज, गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिमाचली, डोगरी, हरियाणवी, उर्दू, मारवाड़ी, राजस्थानी, मेवाती, मालवी, छत्तीसगढ़ी आदि हिन्दी से अलग भाषाएं हैं। इसलिए इन्हें भी भारतीय संविधान में स्थान मिलना चाहिए। इसके लिए वे तरह-तरह के तर्क और कुतर्क देते हैं।
भाषा का एक सीधा सा विज्ञान है। बिना अलग व्याकरण के किसी भाषा का अस्तित्व नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए ‘मैं जा रहा हूं’ का उपरिलिखित बोलियों में अनुवाद करें। एकदम ध्यान में आएगा कि उच्चारण भेद को यदि छोड़ दें, तो प्रायः इसका अनुवाद असंभव है। दूसरी ओर अंग्रेजी में इसका अनुवाद करंे, तो प् ंउ हवपदहण् तुरन्त ध्यान में आता है। यही स्थिति मराठी, गुजराती, बंगला, कन्नड़ आदि की है। इसलिए अनुवाद की कसौटी पर किसी भी भाषा और बोली को आसानी से कसा जा सकता है।
लेकिन इसके बाद भी अनेक विद्वान बोलियों को भाषा बताने और बनाने पर तुले हैं। कृपया वे बताएं कि तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस और सूरदास की रचनाओं को को हिन्दी की मानेंगे या नहीं ? यदि इन्हें हिन्दी की बजाय अवधी और ब्रज की मान लें, तो फिर हिन्दी में बचेगा क्या ? ऐसे ही हजारों नये-पुराने भक्त कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की रचनाएं हैं। यह सब एक षड्यंत्र के अन्तर्गत हो रहा है, जिसे समझना आवश्यक है।
यह षड्यंत्र भारत में अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया। इसे स्वतंत्रता के बाद कांग्रेसी सरकारों ने पुष्ट किया और अब समाचार एवं साहित्य जगत में जड़ जमाए वामपंथी इसे बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजों ने यह समझ लिया था कि भारत को पराधीन बनाये रखने के लिए यहां के हिन्दू समाज की आंतरिक एकता को बल प्रदान करने वाले हर प्रतीक को नष्ट करना होगा। अतः उन्होंने हिन्दू समाज में बाहर से दिखाई देने वाली भाषा, बोली, परम्परा, पूजा-पद्धति, रहन-सहन, खानपान आदि भिन्नताओं को उभारा। फिर इसके आधार पर उन्होंने हिन्दुओं को अनेक वर्गों में बांट दिया।
इस काम में उनकी चैथी सेना अर्थात चर्च ने भरपूर सहयोग दिया। उन्होंने सेवा कार्यों के नाम पर जो विद्यालय खोले, उसमें तथा अन्य अंग्रेजी विद्यालयों में ऐसे लोग निर्मित हुए, जो लार्ड मेकाले के शब्दों में ‘तन से हिन्दू पर मन से अंग्रेज’ थे। इन्होंने सर्वप्रथम भारत के हिन्दू और मुसलमानों को बांटा। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दोनों ने मिलकर संघर्ष किया था। इसलिए इनके बीच गोहत्या से लेकर श्रीरामजन्मभूमि जैसे इतने विवाद उत्पन्न किये कि उसके कारण 1947 में देश का विभाजन हो गया। इस प्रकार उनका पहला षड्यन्त्र (हिन्दुस्थान का बंटवारा) सफल हुआ।
1947 में अंग्रेज तो चले गये; पर वे नेहरू के रूप में अपनी औलाद यहां छोड़ गये। नेहरू स्वयं को गर्व से अंतिम ब्रिटिश शासक कहते भी थे। उन्होंने इस षड्यन्त्र को आगे बढ़ाते हुए हिन्दुओं को ही बांट दिया। हिन्दुओं के हजारों मत, सम्प्रदाय, पंथ आदि को कहा गया कि यदि वे स्वयं को अलग घोषित करेंगे, तो उन्हें अल्पसंख्यक होने का लाभ मिलेगा। इस भ्रम में हिन्दू समाज की खड्ग भुजा कहलाने वाले खालसा सिख और फिर जैन और बौद्ध मत के लोग भी फंस गये। यह प्रक्रिया अंग्रेज ही शुरू कर गये थे। हिन्दू व सिखों को बांटने के लिए मि0 मैकालिफ सिंह और उत्तर-दक्षिण के बीच भेद पैदा करने में मि0 किलमैन और मि0 डेविडसन की भूमिका इतिहास में दर्ज है। ये तीनों आई.सी.एस अधिकारी थे।
इसके बाद उन्होंने वनवासियों को अलग किया। उन्हें समझाया कि तुम वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, सांप, पेड़, नदी .. अर्थात प्रकृति को पूजते हो, जबकि हिन्दू मूर्तिपूजक है। इसलिए तुम्हारा धर्म हिन्दू नहीं है। भोले वनवासी इस चक्कर में आ गये। फिर हिन्दू समाज के उस वीर वर्ग को फुसलाया, जिसे पराजित होने तथा मुसलमान न बनने के कारण कुछ निकृष्ट काम करने को बाध्य किया गया था। या जो परम्परागत रूप से श्रम आधारित काम करते थे। उन्हें अनुसूचित जाति कहा गया। इसी प्रकार क्षत्रियों के एक बड़े वर्ग को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी) नाम दिया गया। इस प्रकार हिन्दू समाज कितने टुकड़ों में बंट सकता है, इस प्रयास में मेकाले से लेकर नेहरू और विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर वामपंथी बुद्धिजीवी तक लगे हैं।
हिन्दुस्थान और हिन्दुओं को बांटने के बाद अब उनकी दृष्टि हिन्दी पर है। व्यापक अर्थ में संस्कृत मां के गर्भ से जन्मी और भारत में कहीं भी विकसित हुई हर भाषा हिन्दी ही है। ऐसी हर भाषा राष्ट्रभाषा है, चाहे उसका नाम तमिल, तेलुगू, पंजाबी या मराठी कुछ भी हो। यद्यपि रूढ़ अर्थ में इसका अर्थ उत्तर भारत में बोली और पूरे देश में समझी जाने वाली भाषा है। इसलिए राष्ट्रभाषा के साथ ही यह सम्पर्क भाषा भी है। जैसे गरम रोटी को एक बार में ही खाना संभव नहीं है। इसलिए उसके कई टुकड़े किये जाते हैं, फिर उसे ठंडाकर धीरे-धीरे खाते हैं। इसी तरह अब बोलियों को भाषा घोषित कर हिन्दी को तोड़ने का षड्यन्त्र चल रहा है।
अंग्रेजों के मानसपुत्रों और देशद्रोही वामपंथियों के उद्देश्य तो स्पष्ट हैं; पर दुर्भाग्य से हिन्दी के अनेक साहित्यकार भी इस षड्यन्त्र के मोहरे बन रहे हैं। उनका लालच केवल इतना है कि यदि इन बोलियों को भाषा मान लिया गया, तो फिर इनके अलग संस्थान बनेंगे। इससे सत्ता के निकटस्थ कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों को महत्वपूर्ण कुर्सियां, लालबत्ती वाली गाड़ी, वेतन, भत्ते आदि मिलेंगे। कुछ लेखकों को पुरस्कार और मान-सम्मान मिल जाएंगे, कुछ को अपनी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए शासकीय सहायता; पर वे यह भूलते हैं कि आज तो उन्हें हिन्दी का साहित्यकार मान कर पूरे देश में सम्मान मिलता है; पर तब वे कुछ जिलों में बोली जाने वाली, निजी व्याकरण से रहित एक बोली (या भाषा) के साहित्यकार रह जाएंगे। साहित्य अकादमी और दिल्ली में जमे उसके पुरोधा भी इस विवाद को बढ़ाने में कम दोषी नहीं हैं।
भाषा और बोली के इस विवाद से अनेक राजनेता भी लाभ उठाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि भारत में अनेक राज्यों का निर्माण भाषाई आधार पर हुआ है। यदि आठ-दस जिलों में बोली जाने वाली हमारी बोली को भाषा मान लिया गया, तो इस आधार पर अलग राज्य की मांग और हिंसक आंदोलन होंगे। आजकल गठबंधन राजनीति और दुर्बल केन्द्रीय सरकारों का युग है। ऐसे में हो सकता है कभी केन्द्र सरकार ऐसे संकट में फंस जाए कि उसे अलग राज्य की मांग माननी पडे़े। यदि ऐसा हो गया, तो फिर अलग सरकार, मंत्री, लालबत्ती और न जाने क्या-क्या ? एक बार मंत्री बने तो फिर सात पीढ़ियों का प्रबंध करने में कोई देर नहीं लगती।
बोलियों को भाषा बनाने के षड्यन्त्र में कुछ लोग तात्कालिक स्वार्थ के लिए सक्रिय हैं, जबकि राष्ट्रविरोधी हिन्दुस्थान और हिन्दू के बाद अब हिन्दी को टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं, जिससे उसे ठंडा कर पूरी तरह खाया जा सके। विश्व की कोई समृद्ध भाषा ऐसी नहीं है, जिसमें सैकड़ों उपभाषाएं, बोलियां या उपबोलियां न हों।
हिन्दी के साथ हो रहे इस षड्यन्त्र को देखकर अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वानों को खुलकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि आज वे चुप रहे, तो हिन्दी की समाप्ति के बाद फिर उन्हीं की बारी है। देश में मुसलमान और अंग्रेजों के आने पर हमारे राजाओं ने यही तो किया था। जब उनके पड़ोसी राज्य को हड़पा गया, तो वे यह सोचकर चुप रहे कि इससे उन्हें क्या फर्क पड़ता है; पर जब उनकी गर्दन दबोची गयी, तो वे बस टुकुर-टुकुर ताकते ही रह गये।
हिन्दी संस्थानों के मुखियाओं को भी अपना हृदय विशाल करना होगा। इनके द्वारा प्रदत्त पुरस्कारों की सूची देखकर एकदम ध्यान में आता है कि अधिकांश पुरस्कार राजधानी या दो चार बड़े शहरों के कुछ खास साहित्यकारों मंे बंट जाते हैं। जिस दल की प्रदेश में सत्ता हो, उससे सम्बन्धित साहित्यकार चयन समिति में होते हैं और वे अपने निकटस्थ लेखकों को सम्मानित कर देते हैं। इससे पुरस्कारों की गरिमा तो गिर ही रही है, साहित्य में राजनीति भी प्रवेश कर रही है। जो लेखक इस उठापटक से दूर रहते हैं, उनके मन में असंतोष का जन्म होता है, जो कभी-कभी बोलियों की अस्मिता के नाम पर भी प्रकट हो उठता है। इसलिए भाषा संस्थानों को राजनीति से पूरी तरह मुक्त रखकर प्रमुख बोलियों के साहित्य के लिए भी अच्छी राशि वाले निजी व शासकीय पुरस्कार स्थापित होने आवश्यक हैं।
भाषा और बोली में चोली-दामन का साथ है। भारत जैसे विविधता वाले देश में ‘तीन कोस पे पानी और चार कोस पे बानी’ बदलने की बात हमारे पूर्वजों ने ठीक ही कही है। जैसे जल से कमल और कमल से जल की शोभा होती है, इसी प्रकार हर बोली अपनी मूल भाषा के सौंदर्य में अभिवृद्धि ही करती है। बोली रूपी जड़ों से कटकर कोई भाषा जीवित नहीं रह सकती। दुर्भाग्य से हिन्दी को उसकी जड़ों से ही काटने का प्रयास हो रहा है। इस षड्यन्त्र को समझना और हर स्तर पर उसका विरोध आवश्यक है। बिल्लियों के झगड़े में बंदर द्वारा लाभ उठाने की कहानी प्रसिद्ध है। भाषा और बोली के इस विवाद में ऐसा ही लाभ अंग्रेजी उठा रही है।
- विजय कुमार, संकटमोचन, रामकृष्णपुरम् – 6, नई दिल्ली – 22

हिन्दुस्थान और हिन्दू के बाद अब हिन्दी को बांटने का षड्यन्त्र सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राद्ध का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी डालते हैं। इस मौसम में कवियों, लेखकों व साहित्यकारों को मंच मिलते हैं और कुछ को लिफाफे भी। इसलिए सब इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं और अपने हिस्से का कर्मकांड पूरा कर फिर साल भर के लिए सो जाते हैं। पर हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) के कर्मकांड के साथ ही कुछ विषयों पर चिंतन भी आवश्यक है। देश में प्रायः भाषा और बोली को लेकर बहस चलती रहती है। कुछ विद्वानों का मत है कि भोजपुरी, बंुदेलखंडी, मैथिली, बज्जिका, मगही, अंगिका, संथाली, अवधी, ब्रज, गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिमाचली, डोगरी, हरियाणवी, उर्दू, मारवाड़ी, राजस्थानी, मेवाती, मालवी, छत्तीसगढ़ी आदि हिन्दी से अलग भाषाएं हैं। इसलिए इन्हें भी भारतीय संविधान में स्थान मिलना चाहिए। इसके लिए वे तरह-तरह के तर्क और कुतर्क देते हैं। भाषा का एक सीधा सा विज्ञान है। बिना अलग व्याकरण के किसी भाषा का अस्तित्व नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए ‘मैं जा रहा हूं’ का उपरिलिखित बोलियों में अनुवाद करें। एकदम ध्यान में आएगा कि उच्चारण भेद को यदि छोड़ दें, तो प्रायः इसका अनुवाद असंभव है। दूसरी ओर अंग्रेजी में इसका अनुवाद करंे, तो प् ंउ हवपदहण् तुरन्त ध्यान में आता है। यही स्थिति मराठी, गुजराती, बंगला, कन्नड़ आदि की है। इसलिए अनुवाद की कसौटी पर किसी भी भाषा और बोली को आसानी से कसा जा सकता है। लेकिन इसके बाद भी अनेक विद्वान बोलियों को भाषा बताने और बनाने पर तुले हैं। कृपया वे बताएं कि तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस और सूरदास की रचनाओं को को हिन्दी की मानेंगे या नहीं ? यदि इन्हें हिन्दी की बजाय अवधी और ब्रज की मान लें, तो फिर हिन्दी में बचेगा क्या ? ऐसे ही हजारों नये-पुराने भक्त कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की रचनाएं हैं। यह सब एक षड्यंत्र के अन्तर्गत हो रहा है, जिसे समझना आवश्यक है। यह षड्यंत्र भारत में अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया। इसे स्वतंत्रता के बाद कांग्रेसी सरकारों ने पुष्ट किया और अब समाचार एवं साहित्य जगत में जड़ जमाए वामपंथी इसे बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजों ने यह समझ लिया था कि भारत को पराधीन बनाये रखने के लिए यहां के हिन्दू समाज की आंतरिक एकता को बल प्रदान करने वाले हर प्रतीक को नष्ट करना होगा। अतः उन्होंने हिन्दू समाज में बाहर से दिखाई देने वाली भाषा, बोली, परम्परा, पूजा-पद्धति, रहन-सहन, खानपान आदि भिन्नताओं को उभारा। फिर इसके आधार पर उन्होंने हिन्दुओं को अनेक वर्गों में बांट दिया। इस काम में उनकी चैथी सेना अर्थात चर्च ने भरपूर सहयोग दिया। उन्होंने सेवा कार्यों के नाम पर जो विद्यालय खोले, उसमें तथा अन्य अंग्रेजी विद्यालयों में ऐसे लोग निर्मित हुए, जो लार्ड मेकाले के शब्दों में ‘तन से हिन्दू पर मन से अंग्रेज’ थे। इन्होंने सर्वप्रथम भारत के हिन्दू और मुसलमानों को बांटा। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दोनों ने मिलकर संघर्ष किया था। इसलिए इनके बीच गोहत्या से लेकर श्रीरामजन्मभूमि जैसे इतने विवाद उत्पन्न किये कि उसके कारण 1947 में देश का विभाजन हो गया। इस प्रकार उनका पहला षड्यन्त्र (हिन्दुस्थान का बंटवारा) सफल हुआ। 1947 में अंग्रेज तो चले गये; पर वे नेहरू के रूप में अपनी औलाद यहां छोड़ गये। नेहरू स्वयं को गर्व से अंतिम ब्रिटिश शासक कहते भी थे। उन्होंने इस षड्यन्त्र को आगे बढ़ाते हुए हिन्दुओं को ही बांट दिया। हिन्दुओं के हजारों मत, सम्प्रदाय, पंथ आदि को कहा गया कि यदि वे स्वयं को अलग घोषित करेंगे, तो उन्हें अल्पसंख्यक होने का लाभ मिलेगा। इस भ्रम में हिन्दू समाज की खड्ग भुजा कहलाने वाले खालसा सिख और फिर जैन और बौद्ध मत के लोग भी फंस गये। यह प्रक्रिया अंग्रेज ही शुरू कर गये थे। हिन्दू व सिखों को बांटने के लिए मि0 मैकालिफ सिंह और उत्तर-दक्षिण के बीच भेद पैदा करने में मि0 किलमैन और मि0 डेविडसन की भूमिका इतिहास में दर्ज है। ये तीनों आई.सी.एस अधिकारी थे। इसके बाद उन्होंने वनवासियों को अलग किया। उन्हें समझाया कि तुम वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, सांप, पेड़, नदी .. अर्थात प्रकृति को पूजते हो, जबकि हिन्दू मूर्तिपूजक है। इसलिए तुम्हारा धर्म हिन्दू नहीं है। भोले वनवासी इस चक्कर में आ गये। फिर हिन्दू समाज के उस वीर वर्ग को फुसलाया, जिसे पराजित होने तथा मुसलमान न बनने के कारण कुछ निकृष्ट काम करने को बाध्य किया गया था। या जो परम्परागत रूप से श्रम आधारित काम करते थे। उन्हें अनुसूचित जाति कहा गया। इसी प्रकार क्षत्रियों के एक बड़े वर्ग को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी) नाम दिया गया। इस प्रकार हिन्दू समाज कितने टुकड़ों में बंट सकता है, इस प्रयास में मेकाले से लेकर नेहरू और विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर वामपंथी बुद्धिजीवी तक लगे हैं। हिन्दुस्थान और हिन्दुओं को बांटने के बाद अब उनकी दृष्टि हिन्दी पर है। व्यापक अर्थ में संस्कृत मां के गर्भ से जन्मी और भारत में कहीं भी विकसित हुई हर भाषा हिन्दी ही है। ऐसी हर भाषा राष्ट्रभाषा है, चाहे उसका नाम तमिल, तेलुगू, पंजाबी या मराठी कुछ भी हो। यद्यपि रूढ़ अर्थ में इसका अर्थ उत्तर भारत में बोली और पूरे देश में समझी जाने वाली भाषा है। इसलिए राष्ट्रभाषा के साथ ही यह सम्पर्क भाषा भी है। जैसे गरम रोटी को एक बार में ही खाना संभव नहीं है। इसलिए उसके कई टुकड़े किये जाते हैं, फिर उसे ठंडाकर धीरे-धीरे खाते हैं। इसी तरह अब बोलियों को भाषा घोषित कर हिन्दी को तोड़ने का षड्यन्त्र चल रहा है। अंग्रेजों के मानसपुत्रों और देशद्रोही वामपंथियों के उद्देश्य तो स्पष्ट हैं; पर दुर्भाग्य से हिन्दी के अनेक साहित्यकार भी इस षड्यन्त्र के मोहरे बन रहे हैं। उनका लालच केवल इतना है कि यदि इन बोलियों को भाषा मान लिया गया, तो फिर इनके अलग संस्थान बनेंगे। इससे सत्ता के निकटस्थ कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों को महत्वपूर्ण कुर्सियां, लालबत्ती वाली गाड़ी, वेतन, भत्ते आदि मिलेंगे। कुछ लेखकों को पुरस्कार और मान-सम्मान मिल जाएंगे, कुछ को अपनी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए शासकीय सहायता; पर वे यह भूलते हैं कि आज तो उन्हें हिन्दी का साहित्यकार मान कर पूरे देश में सम्मान मिलता है; पर तब वे कुछ जिलों में बोली जाने वाली, निजी व्याकरण से रहित एक बोली (या भाषा) के साहित्यकार रह जाएंगे। साहित्य अकादमी और दिल्ली में जमे उसके पुरोधा भी इस विवाद को बढ़ाने में कम दोषी नहीं हैं। भाषा और बोली के इस विवाद से अनेक राजनेता भी लाभ उठाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि भारत में अनेक राज्यों का निर्माण भाषाई आधार पर हुआ है। यदि आठ-दस जिलों में बोली जाने वाली हमारी बोली को भाषा मान लिया गया, तो इस आधार पर अलग राज्य की मांग और हिंसक आंदोलन होंगे। आजकल गठबंधन राजनीति और दुर्बल केन्द्रीय सरकारों का युग है। ऐसे में हो सकता है कभी केन्द्र सरकार ऐसे संकट में फंस जाए कि उसे अलग राज्य की मांग माननी पडे़े। यदि ऐसा हो गया, तो फिर अलग सरकार, मंत्री, लालबत्ती और न जाने क्या-क्या ? एक बार मंत्री बने तो फिर सात पीढ़ियों का प्रबंध करने में कोई देर नहीं लगती। बोलियों को भाषा बनाने के षड्यन्त्र में कुछ लोग तात्कालिक स्वार्थ के लिए सक्रिय हैं, जबकि राष्ट्रविरोधी हिन्दुस्थान और हिन्दू के बाद अब हिन्दी को टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं, जिससे उसे ठंडा कर पूरी तरह खाया जा सके। विश्व की कोई समृद्ध भाषा ऐसी नहीं है, जिसमें सैकड़ों उपभाषाएं, बोलियां या उपबोलियां न हों। हिन्दी के साथ हो रहे इस षड्यन्त्र को देखकर अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वानों को खुलकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि आज वे चुप रहे, तो हिन्दी की समाप्ति के बाद फिर उन्हीं की बारी है। देश में मुसलमान और अंग्रेजों के आने पर हमारे राजाओं ने यही तो किया था। जब उनके पड़ोसी राज्य को हड़पा गया, तो वे यह सोचकर चुप रहे कि इससे उन्हें क्या फर्क पड़ता है; पर जब उनकी गर्दन दबोची गयी, तो वे बस टुकुर-टुकुर ताकते ही रह गये। हिन्दी संस्थानों के मुखियाओं को भी अपना हृदय विशाल करना होगा। इनके द्वारा प्रदत्त पुरस्कारों की सूची देखकर एकदम ध्यान में आता है कि अधिकांश पुरस्कार राजधानी या दो चार बड़े शहरों के कुछ खास साहित्यकारों मंे बंट जाते हैं। जिस दल की प्रदेश में सत्ता हो, उससे सम्बन्धित साहित्यकार चयन समिति में होते हैं और वे अपने निकटस्थ लेखकों को सम्मानित कर देते हैं। इससे पुरस्कारों की गरिमा तो गिर ही रही है, साहित्य में राजनीति भी प्रवेश कर रही है। जो लेखक इस उठापटक से दूर रहते हैं, उनके मन में असंतोष का जन्म होता है, जो कभी-कभी बोलियों की अस्मिता के नाम पर भी प्रकट हो उठता है। इसलिए भाषा संस्थानों को राजनीति से पूरी तरह मुक्त रखकर प्रमुख बोलियों के साहित्य के लिए भी अच्छी राशि वाले निजी व शासकीय पुरस्कार स्थापित होने आवश्यक हैं। भाषा और बोली में चोली-दामन का साथ है। भारत जैसे विविधता वाले देश में ‘तीन कोस पे पानी और चार कोस पे बानी’ बदलने की बात हमारे पूर्वजों ने ठीक ही कही है। जैसे जल से कमल और कमल से जल की शोभा होती है, इसी प्रकार हर बोली अपनी मूल भाषा के सौंदर्य में अभिवृद्धि ही करती है। बोली रूपी जड़ों से कटकर कोई भाषा जीवित नहीं रह सकती। दुर्भाग्य से हिन्दी को उसकी जड़ों से ही काटने का प्रयास हो रहा है। इस षड्यन्त्र को समझना और हर स्तर पर उसका विरोध आवश्यक है। बिल्लियों के झगड़े में बंदर द्वारा लाभ उठाने की कहानी प्रसिद्ध है। भाषा और बोली के इस विवाद में ऐसा ही लाभ अंग्रेजी उठा रही है। -




हिन्दी

हिन्दी हिन्दी हिन्दी

चलो मनाएं दिवस हिन्दी

जहाँ मातृभाषा है हिन्दी

जहाँ सोते जागते खाते पीते बोलते हैं हिन्दी

जहाँ अपनापन जगाती है हिन्दी

सबको एक बनाती है हिन्दी

अजनबी सी होती हिन्दी

अंग्रेजी संग बौनी लगती हिन्दी

सरकारी उपेक्षा का शिकार हिन्दी

स्कूल किताबों से दूर जाती हिन्दी

अंग्रेजी संग संघर्ष करती हिन्दी

अपना अस्तित्व बचाती हिन्दी

समय साथ बदली हिन्दी

अंग्रेजी संग बोली जाती हिन्दी

तब हिंग्रेजी बन जाती हिन्दी

सबका काम कराती हिन्दी

हिन्दुस्तान की आन है हिन्दी

हिन्दुस्तान की शान है हिन्दी

हिन्दुस्तान को हिन्दुस्तान बनाती हिन्दी

हिन्दुस्तान की पहचान है हिन्दी

- कामोद




हिंदी विरोध राष्ट्र की प्रगति में बाधक
1949 से लेकर आज तक अर्द्धशताब्दी में हम राष्ट्रीय जीवन के यथार्थ में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की यह घोषणा साकार नहीं कर पाए।

है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी

स्वामी दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी ने देश के भविष्य के लिए, देश की एकता और अस्मिता के लिए हिंदी को ही राष्ट्र की संपर्क भाषा माना। भारतेंदु ने सूत्ररूप में कहा, निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने एक निबंध में लिखा है, जिस हिंदी भाषा के खेत में ऐसी सुनहरी फसल फली है, वह भाषा भले ही कुछ दिन यों ही पड़ी रहे, तो भी उसकी स्वाभाविक उर्वरता नहीं मर सकती, वहाँ फिर खेती के सुदिन आएँगे और पौष मास में नवान्न उत्सव होगा। जैसा कि मेरे गुरु कुलपति कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने कहा था, हिंदी ही हमारे राष्ट्रीय एकीकरण का सबसे शक्तिशाली और प्रधान माध्यम है। यह किसी प्रदेश या क्षेत्र की भाषा नहीं, बल्कि समस्त भारत की भारती के रूप में ग्रहण की जानी चाहिए। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने यह घोषणा की थी कि हिंदी के विरोध का कोई भी आंदोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है।

महात्मा गांधी ने भागलपुर में महामना पंडित मनमोहन मालवीय का हिंदी भाषण सुनकर अनुपम काव्यात्मक शब्दों में कहा था, पंडित जी का अंग्रेज़ी भाषण चाँदी की तरह चमकता हुआ कहा जाता है, किंतु उनका हिंदी भाषण इस तरह चमका है - जैसे मानसरोवर से निकलती हुई गंगा का प्रवाह सूर्य की किरणों से सोने की तरह चमकता है। हमारे प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का प्रत्येक भाषण भी इसी प्रकार सूर्य की किरणों से सोने की तरह चमकता हुआ गंगा के प्रवाह की तरह लगता है। फिर क्यों हिंदी का प्रवाह रुका हुआ है?




सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक पुरातन देश है, किंतु राजनीतिक दृष्टि से एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत का विकास एक नए सिरे से ब्रिटेन के शासनकाल में, स्वतंत्रता-संग्राम के साहचर्य में और राष्ट्रीय स्वाभिमान के नवोन्मेष के सोपान में हुआ। हिंदी भाषा एवं अन्य प्रादेशिक भारतीय भाषाओं ने राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता-संग्राम के चैतन्य का शंखनाद घर-घर तक पहुँचाया, स्वदेश प्रेम और स्वदेशी भाव की मानसिकता को सांस्कृतिक और राजनीतिक आयाम दिया, नवयुग के नवजागरण को राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय स्वशासन के साथ अंतरंग और अविच्छिन्न रूप से जोड़ दिया। =...........................





भाषाओं की भूमिका

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे भाषाएँ भारतीय स्वाधीनता के अभियान और आंदोलन को व्यापक जनाधार देते हुए लोकतंत्र की इस आधारभूत अवधारणा को संपुष्ट करतीं रहीं कि जब आज़ादी आएगी तो लोक-व्यवहार और राजकाज में भारतीय भाषाओं का प्रयोग होगा।..........................





एक भाषाः प्रशासन की भाषा

आज़ादी आई और हमने संविधान बनाने का उपक्रम शुरू किया। संविधान का प्रारूप अंग्रेज़ी में बना, संविधान की बहस अधिकांशतः अंग्रेज़ी में हुई। यहाँ तक कि हिंदी के अधिकांश पक्षधर भी अंग्रेज़ी भाषा में ही बोले। यह बहस 12 सितंबर, 1949 को 4 बजे दोपहर में शुरू हुई और 14 सितंबर, 1949 के दिन समाप्त हुई। प्रारंभ में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अंग्रेज़ी में ही एक संक्षिप्त भाषण दिया। उन्होंने कहा कि भाषा के विषय में आवेश उत्पन्न करने या भावनाओं को उत्तेजित करने के लिए कोई अपील नहीं होनी चाहिए और भाषा के प्रश्न पर संविधान सभा का विनिश्चय समूचे देश को मान्य होना चाहिए। उन्होंने बताया कि भाषा संबंधी अनुच्छेदों पर लगभग तीन सौ या उससे भी अधिक संशोधन प्रस्तुत हुए।

14 सितंबर की शाम बहस के समापन के बाद जब भाषा संबंधी संविधान का तत्कालीन भाग 14 क और वर्तमान भाग 17, संविधान का भाग बन गया तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने भाषण में बधाई के कुछ शब्द कहे। वे शब्द आज भी प्रतिध्वनित होते हैं। उन्होंने तब कहा था, आज पहली ही बार ऐसा संविधान बना है जब कि हमने अपने संविधान में एक भाषा रखी है, जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी। उन्होंने कहा, इस अपूर्व अध्याय का देश के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने इस बात पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की कि संविधान सभा ने अत्यधिक बहुमत से भाषा-विषयक प्रावधानों को स्वीकार किया। अपने वक्तव्य के उपसंहार में उन्होंने जो कहा वह अविस्मरणीय है। उन्होंने कहा, यह मानसिक दशा का भी प्रश्न है जिसका हमारे समस्त जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। हम केंद्र में जिस भाषा का प्रयोग करेंगे उससे हम एक-दूसरे के निकटतर आते जाएँगे। आख़िर अंग्रेज़ी से हम निकटतर आए हैं, क्योंकि वह एक भाषा थी। अंग्रेज़ी के स्थान पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है। इससे अवश्यमेव हमारे संबंध घनिष्ठतर होंगे, विशेषतः इसलिए कि हमारी परंपराएँ एक ही हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं। अतएव यदि हम इस सूत्र को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत-सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते थे। हमने यथासंभव बुद्धिमानी का कार्य किया है और मुझे हर्ष है, मुझे प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी संतति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।




संघ की भाषा हिंदी

संविधान-सभा की भाषा-विषयक बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई है। भाषा-विषयक समझौते की बातचीत में मेरे पितृतुल्य एवं कानून के क्षेत्र में मेरे गुरु डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी एवं श्री गोपाल स्वामी आयंगार की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह सहमति हुई कि संघ की भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, किंतु देवनागरी में लिखे जाने वाले अंकों तथा अंग्रेज़ी को 15 वर्ष या उससे अधिक अवधि तक प्रयोग करते रहने के बारे में बड़ी लंबी-चौड़ी गरमा-गरम बहस हुई। अंत में आयंगर-मुंशी फ़ार्मूला भारी बहुमत से स्वीकार हुआ। वास्तव में अंकों को छोड़कर संघ की राजभाषा के प्रश्न पर अधिकांश सदस्य सहमत हो गए। अंकों के बारे में भी यह स्पष्ट था कि अंतर्राष्ट्रीय अंक भारतीय अंकों का ही एक नया संस्करण है। कुछ सदस्यों ने रोमन लिपि के पक्ष में प्रस्ताव रखा, किंतु देवनागरी के पक्ष में ही अधिकांश सदस्यों ने अपनी राय दी।....................



हिंदी का अपहरण

आशंकाओं का खांडव-वन तब दिखाई देने लगा, जब पंद्रह वर्ष की कालावधि के बाद भी अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग की बात सामने आई। वे आशंकाएँ सच साबित हुईं। पंद्रह वर्ष 1965 में समाप्त होने वाले थे। उससे पूर्व ही संसद में उस अवधि को अनिश्चित काल तक बढ़ाने का प्रस्ताव पेश हुआ। तब मैं लोकसभा का निर्दलीय सदस्य था। स्व. लालबहादुर शास्त्री, पंडित नेहरू की मंत्रीपरिषद के वरिष्ठ सदस्य थे और उन्हीं को यह कठिन काम सौंपा गया। कुछ सदस्यों ने कार्यवाही के बहिष्कार के लिए सदन-त्याग किया। तब मैंने कहा कि मुझे तो सदन में प्रवेश के लिए और अपनी बात कहने के लिए चुना गया है, सदन के बहिष्कार और सदन-त्याग के लिए नहीं। सदन में मैंने अकेले ही प्रत्येक अनुच्छेद एवं उपबंध का विरोध किया। बाद में श्रद्धेय शास्त्री जी ने बड़ी आत्मीयता के साथ संसद की दीर्घा में खड़े-खड़े कहा, आपकी बात मैं समझता हूँ, सहमत भी हूँ, किंतु लाचारी है, आप इस लाचारी को भी तो समझिए। अब संविधानिक स्थिति यह है कि नाम के वास्ते तो संघ की राजभाषा हिंदी है और अंग्रेज़ी सह भाषा है, जबकि वास्तव में अंग्रेज़ी ही राजभाषा है और हिंदी केवल एक सह भाषा। लगता है कि संविधान में इन प्रावधानों का प्रारूप बनाते समय कुछ संविधान निर्माताओं के मस्तिष्क में यह बात पहले से थी। हुआ यह कि राजनीति की भाषा और भाषा की राजनीति ने मिलकर हिंदी की नियति का अपहरण कर लिया।



संसद में हिंदी के प्रबल पक्षधर कम हैं

संविधान सभा में श्री गोपाल स्वामी आयंगर ने अपने भाषण में यह स्पष्ट ही कह दिया था कि हमें अंग्रेज़ी भाषा को कई वर्षों तक रखना पड़ेगा और लंबे समय तक उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में भी सभी कार्यवाहियाँ, अंग्रेज़ी भाषा में ही होंगी एवं अध्यादेशों, विधेयकों तथा अधिनियमों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेज़ी भाषा में ही होंगे। इस लंबे होते जा रहे समय में मुझे एक अविचल स्थायी भाव की आहट सुनाई देती है। मुझे नहीं लगता कि आनेवाले पच्चीस वर्षों में उच्चतम न्यायालय या अहिंदी भाषी प्रदेशों के उच्च न्यायालय हिंदी में अपनी कार्यवाही करने को तैयार होंगे। तब तक हिंदी के प्रयोग की संभावना और भी अधिक धूमिल हो जाएगी। यह अवश्य है कि हिंदीभाषी प्रदेशों में, न्यायालयों में हिंदी धीरे-धीरे बढ़ रही है, किंतु जजों के स्थानांतरण की नीति हिंदी के प्रयोग को अवश्यमेव अवरुद्ध करेगी। उच्च न्यायालयों के अंतर्गत दूसरे न्यायालयों में प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग काफ़ी बढ़ा है, किंतु उनको भी अधिनियमों एवं उपनियमों के प्राधिकृत पाठ के लिए एवं नाज़िरों के लिए बहुधा अंग्रेज़ी भाषा की ही शरण लेनी पड़ती है। विधान मंडलों में प्रादेशिक भाषाएँ पूरी तरह चल पड़ी हैं। संसद में इधर हिंदी में भाषण देनेवाले सदस्यों की संख्या बढ़ी है, किंतु हिंदी के प्रबल पक्षधर कम हैं। राष्ट्रीय राजनीति के प्रादेशीकरण के चलते अब हिंदी को फूँक-फूँककर कदम रखना होगा, किंतु हिंदी का संघर्ष प्रादेशिक भाषाओं से नहीं हैं, उसके रास्ते में अंग्रेज़ी के स्थापित वर्चस्व की बाधा है।

हिंदी का विकास संसद के माध्यम से

जब संविधान पारित हुआ तब यह आशा और प्रत्याशा जागरूक थी कि भारतीय भाषाओं का विस्तार होगा, राजभाषा हिंदी के प्रयोग में द्रुत गति से प्रगति होगी और संपर्क भाषा के रूप में हिंदी राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित होगी। संविधान के अनुच्छेद 350 में निर्दिष्ट है कि किसी शिकायत के निवारण के लिए प्रत्येक व्यक्ति संघ या राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को संघ में या राज्य में प्रयोग होनेवाली किसी भाषा में प्रतिवेदन देने का अधिकार होगा। 1956 में अनुच्छेद 350 क संविधान में अंतःस्थापित हुआ और यह निर्दिष्ट हुआ कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास किया जाए। अनुच्छेद 344 में राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। प्रयोजन यह था कि संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग हो, संघ और राज्यों के बीच राजभाषा का प्रयोग बढ़े, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के प्रयोग को सीमित या समाप्त किया जाए। हिंदी भाषा के विकास के लिए यह विशेष निर्देश अनुच्छेद 351 में दिया गया कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके एवं उसका शब्द भंडार समृद्ध और संवर्धित हो।



संकल्प खो गया
हिंदी के विषय में लगता है संविधान के संकल्पों का निष्कर्ष कहीं खो गया है। संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की शक्ति, क्षमता और सामर्थ्य अकाट्य, अदम्य और अद्वितीय है, किंतु सहज ही मन में प्रश्न उठता है कि हमने संविधान के सपने को साकार करने के लिए क्या किया? क्यों नहीं हमारे कार्यक्रम प्रभावी हुए? क्यों और कैसे अंग्रेज़ी भाषा की मानसिकता हम पर और हमारी युवा एवं किशोर पीढ़ियों पर इतनी हावी हो चुकी है कि हमारी अपनी भाषाओं की अस्मिता और भविष्य संकट में हैं? शिक्षा में, व्यापार और व्यवहार में, संसदीय, शासकीय और न्यायिक प्रक्रियाओं में हिंदी को और प्रादेशिक भाषाओं को पाँव रखने की जगह तो मिली, संख्या का आभास भी मिला, किंतु प्रभावी वर्चस्व नहीं मिल पाया। वोट माँगने के लिए, जन साधारण तक पहुँचने के लिए आज भी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है, किंतु हमारे अधिकारी वर्ग और हमारे नीति-निर्माताओं के चिंतन में अभी भारतीय भाषाओं के लिए, हिंदी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के समकक्ष कोई स्थान नहीं है। हमारी अंतर्राष्ट्रीयता राष्ट्रीय जड‍़ों रहित होती जा रही है। जनता-जनार्दन से जीवंत संपर्क का अभाव हमारी अस्मिता को निष्प्रभ और खोखला कर देगा, इसमें कोई संशय नहीं है।.......................... 



विदेशी भाषा से राष्ट्र महान नहीं बनता
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितंबर 1949 के दिन बहस में भाग लेते हुए यह रेखांकित किया था कि यद्यपि अंग्रेज़ी से हमारा बहुत हित साधन हुआ है और इसके द्वारा हमने बहुत कुछ सीखा है तथा उन्नति की है, किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता। उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सोच को आधारभूत मानकर कहा कि विदेशी भाषा के वर्चस्व से नागरिकों में दो श्रेणियाँ स्थापित हो जाती हैं, क्योंकि कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती। उन्होंने मर्मस्पर्शी शब्दों में महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को प्रतिपादित करते हुए कहा, भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए।



राष्ट्रीय सहमति का संकल्प क्षीण हो गया

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बहस में भाग लेते हुए हिंदी भाषा और देवनागरी का राजभाषा के रूप में समर्थन किया और भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय अंकों को मान्यता देने के लिए अपील की। उन्होंने इस निर्णय को ऐतिहासिक बताते हुए संविधान सभा से अनुरोध किया कि वह इस अवसर के अनुरूप निर्णय करे और अपनी मातृभूमि में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में वास्तविक योग दे। उन्होंने कहा कि अनेकता में एकता ही भारतीय जीवन की विशेषता रही है और इसे समझौते तथा सहमति से प्राप्त करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम हिंदी को मुख्यतः इसलिए स्वीकार कर रहे हैं कि इस भाषा के बोलनेवालों की संख्या अन्य किसी भाषा के बोलनेवालों की संख्या से अधिक है - लगभग 32 करोड़ में से 14 करोड़ (1949 में)। उन्होंने अंतरिम काल में अंग्रेज़ी भाषा को स्वीकार करने के प्रस्ताव को भारत के लिए हितकर माना। उन्होंने अपने भाषण में इस बात पर बल दिया और कहा कि अंग्रेज़ी को हमें उत्तरोत्तर हटाते जाना होगा। साथ ही उन्होंने अंग्रेज़ी के आमूलचूल बहिष्कार का विरोध किया। उन्होंने कहा, स्वतंत्र भारत के लोगों के प्रतिनिधियों का कर्तव्य होगा कि वे इस संबंध में निर्णय करें कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को उत्तरोत्तर किस प्रकार प्रयोग में लाया जाए और अंग्रेज़ी को किस प्रकार त्यागा जाए।

यदि हमारी धारणा हो कि कुछ प्रयोजनों के लिए हमेशा अंग्रेज़ी ही प्रयोग में आए और उसी भाषा में शिक्षा दी जाए तो इसमें लज्जा की कोई बात नहीं है। उन्होंने भाषा परिषदों की स्थापना का सुझाव दिया ताकि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का सुचारु और तुलनात्मक अध्ययन हो। सभी भाषाओं की चुनी हुई रचनाओं को देवनागरी में प्रकाशित किया जाए और वाणिज्यिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक और कला संबंधी शब्दों को निरपेक्ष रूप से निश्चित किया जाए। किंतु महात्मा गांधी की दृष्टि और उनका कार्यक्रम, पं. नेहरू की सोच और डॉ. मुखर्जी के सुझाव क्यों नहीं क्रियान्वित हुए? क्यों राष्ट्रीय सहमति का संकल्प क्षीण और शिथिल हो गया?




मंज़िल दूर है

श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिन्होंने राजभाषा के रूप में एक समय हिंदी का विरोध किया था, ने स्वयं 1956-57 में यह माना कि हिंदी भारत के बहुमत की भाषा है, राष्ट्रीय भाषा होने का दावा कर सकती है और भविष्य में हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा होना निश्चित है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के सभी भागों में सारी शिक्षा का एक उद्देश्य हिंदी का पूर्ण ज्ञान भी होना चाहिए और यह आशा प्रकट की कि संचार-व्यवस्था और वाणिज्य की प्रगति निश्चय ही यह कार्य संपन्न करेगी। स्व. गंगाशरण सिंह, कविवर रामधारी सिंह दिनकर, प्रकाशवीर शास्त्री और शंकरदयाल सिंह का योगदान आज याद आता है, किंतु हमारी यात्रा अभी अधूरी है, मंज़िल बहुत दूर और दु:साध्य है, पर हमें हिंदी के लिए की गई प्रतिज्ञाओं का पाथेय लेकर चलते रहना है।

हिंदी का तुलसीदल कहाँ है?

इस वर्ष लंदन में छठा विश्व हिंदी सम्मेलन होने जा रहा है। ब्रिटेन में कुछ ही वर्षों में मैंने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कई संस्थाएँ बनाईं, उन्हें प्रोत्साहन दिया और भारतवंशी लोगों में हिंदी के प्रति एक नई ललक, एक नया उत्साह, एक समर्पित निष्ठा पाई, किंतु विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी का वैश्विक अंतर्राष्ट्रीय मंच है, जिसका उद्गम है भारत। अगर विश्व हिंदी सम्मेलन हमें यह पूछे कि भारत में हिंदी का आंदोलन-अभियान क्यों शिथिल पड़ गया है, क्यों भारत अपने संविधान का संकल्प और सपना अब तक साकार नहीं कर पाया, तो हम क्या उत्तर देंगे? जब तक भारत में हिंदी नहीं होगी, विश्व में हिंदी कैसे हो सकती है? जब तक हिंदी भाषा राष्ट्रीय संपर्क की भाषा नहीं बनती, जब तक हिंदी शिक्षा का माध्यम एवं शोध और विज्ञान की भाषा नहीं बनती और जब तक हिंदी शासन, प्रशासन, विधि नियम और न्यायालयों की भाषा नहीं बनती, भारत के आँगन में नवान्न का उत्सव कैसे होगा, हिंदी का तुलसीदल कैसे पल्लवित होगा?

मैं हिंदी की तूती हूँ

मुझे याद आता है सदियों पुराना अमीर खुसरो का फ़ारसी में यह कथन कि मैं हिंदी की तूती हूँ, तुम्हें मुझसे कुछ पूछना हो तो हिंदी में पूछो, तब मैं तुम्हें सब कुछ बता दूँगा। कब आएगा वह स्वर्ण विहान जब अमीर खुसरो के शब्दों में हिंदी की तूती बजेगी, बोलेगी और भारतीय भाषाएँ भारत माता के गले में एक वरेण्य, मनोरम अलंकार के रूप में सुसज्जित और शोभायमान होंगी। यह उपलब्धि राज्यशक्ति और लोकशक्ति के समवेत, संयुक्त और समर्पित प्रयत्नों से ही संभव है।

(कादंबिनी से साभार)




‎'जिसको न जिन गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं, पशु निरा है और मृतक समान है।'
कितनी सच बात है यह। अगर हमारे दिल में हमारे देश के लिए, हमारी राष्ट्रभाषा के लिए, गौरव नहीं है, तो हमारा गौरवहीन जीवन है - हम मृतक समान हैं।

अंग्रेजों ने बहुत सावों तक हमारे देश में शासन किया, हमने उनका रहन-सहन देखा, उनकी भाषा हमारे कानों में समाती रही। हमारे नेताओं ने बड़े संघर्ष के बाद अंग्रेजों को भारत से निकलने को मजबूर कर दिया। वे चले गए, परंतु अंग्रेजियत हमारा पीछा नहीं छोड़ती।

हिंदी हमें भावनात्मक एकता से जोड़ती है। राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी हमारे देश की एकता में सबसे अधिक सहायक हो सकती है। फिर भी हम अंग्रेजी के पीछे भागते हैं। यह हमारी कैसी नादानी है?

अपने-अपने प्रांतों और अंचलों की भाषाएं भिन्न हो सकती हैं, परंतु उनका अंग्रेजी से कोई सरोकार है, तो क्या हिंदी से नहीं हो सकता? फिर हिंदी तो एकता का सूत्र है। वैसे भी हम देखते हैं कि कोई भी प्रांत या अंचल हो, हिंदी फिल्में और गीत सभी को अच्छे लगते हैं।

अंग्रेजों के जाने के बाद हमारा गणतंत्र बना, तो 15 सालों तक हिंदी के साथ अंग्रेजी भी चलते रहने की बात हुई थी। बाद में सारा कामकाज सिर्फ हिंदी में होना था। मगर आज स्थिति वैसी की वैसी है। अंग्रेजी हम निकाल नहीं सके। यह राष्ट्रभाषा हिंदी की कैसी अवहेलना है? हम अपनी मां को तो सम्मान न करें और पड़ोसी की मां की सेवा करें- यह कैसा न्याय है?

हमें आत्मचिंतन करना चाहिए कि भला ऐसा क्यों हो रहा है? हमें अपनी राष्ट्रभाषा से प्यार क्यों नहीं है? हिंदी का आदर बढ़ाने के लिए हमें क्या करना चाहिए? हमें विश्वास करना चाहिए कि राष्ट्रभाषा की जगह हिंदी के अलावा अन्य कोई भाषा नहीं ले सकती। यह भाषा समस्त राष्ट्र को एकता के मार्ग पर चला सकती है। हिंदी के विकास में ही देश की उन्नति व विकास समाया हुआ है। हर प्रांत के लोग हिंदी समझ लेते हैं, इसलिए यह भावनात्मक एकता की कड़ी है।

सरकारी कामकाज में हिंदी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग होना चाहिए। हिंदी की जगह कोई अन्य भारतीय भाषा आंचलिक आधार पर हो सकती है, लेकिन अंग्रेजी का कोई औचित्य नहीं है।

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, हमारे प्राणों की भाषा है, हमारे दिल की पुकार है। उसे अपनाना हमारा धर्म है। इसे अपनाने से हमारी खुद की गरिमा बढ़ेगी। हम सभी एक-दूसरे के और निकट हो जाएंगे।

हम हिंदी दिवस भला क्यों मनाते हैं? अपने ही देश में अपनी ही भाषा अपनाने के लिए ढिंढोरा पीटना मुनासिब है क्या? हमें बार-बार कहना पड़ता है कि हिंदी को अपनाओ-भला क्यों? झूठे दिखावे व रहन-सहन में अंग्रेजियत ने हमें हिंदी से दूर कर रखा है। आज समय आ गया है, जब हमें हिंदी अपनानी ही होगी। अगर हम खुद अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तो विश्व में कोई हमारा भी सम्मान नहीं करेगा। विद्यालय, महाविद्यालय, सरकारी कार्यालय, अदालत सभी जगह रोजमर्रा के कामकाज में हिंदी को पर्याप्त स्थान देना चाहिए। विश्व के उच्चस्तरीय साहित्यों का हिंदी में अनुवाद होना चाहिए।

हिंदी बोलने वालों को हीन भावना से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन्हें सम्मान देना चाहिए। जब यह सब होगा, तभी हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि हिंदी हमारी भाषा है-राजभाषा है- राष्ट्रभाषा है। हिंदी सिर्फ हिंदी है। इसका स्थान कोई विदेशी भाषा नहीं ले सकती। यह हमारे देश की एकता की कड़ी है। हमें इसका अभिमान है।
(दिवगंत लेखक नरेश कुमार प्रसार भारती के अनुसंधान विभाग में उपनिदेशक थे।)



हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामना . हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार का संकल्प लें .


एक दिन में क्या होगा ? इसे अपने जीवन शैली में रोजाना उपयोग करना होगा , और ये सिर्फ आप ( प्रत्येक ब्यक्ति ) ही कर सकते हैं | राष्ट्र भाषा हिंदी में लिखने वालों को और हिंदी भाषा का सम्मान करने वालों को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

श्राद्ध पक्ष में क्या करें? ‎" गयाजी की महिमा : गया श्राद्धसे प्रेतयोनिसे मुक्ति "

‎" गयाजी की महिमा : गया श्राद्धसे प्रेतयोनिसे मुक्ति "
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गयाजी की महिमा : गया श्राद्धसे प्रेतयोनिसे मुक्ति

Gaya Shraddh (Pind Daan) ॐ गयायै नमः । ॐ गदाधराय नमः ।वायुपुराण आदि कई पुराणोंमें आया है कि किसी प्रेतने एक वैश्यसे कहा कि ‘आप मेरे नामसे गयाशिरमें पिण्डदान कर दें, इससे हमारी प्रेतयोनिसे मुक्ति हो जायेगी। मेरा सम्पूर्ण धन आप ले लें और उसे लेकर मेरे उद्धेश्यसे गयाश्राद्ध कर दें। इसके बदलेमें मैं अपनीसम्पत्तीका छठा अंश आपको पारिश्रमिकके रुपमें दे रहा हूँ। मैं आपको अपना नाम-गोत्रादि भी बता रहा हूँ।’ प्रेतके अनुरोधपर उस वणिक्‌ने गयाकी यात्रा की और
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श्राद्ध पक्ष में क्या करें?
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-प्रस्तुति डॉ. मनस्वी श्री विद्यालंकार : - 

पितरों की संतुष्टि हेतु विभिन्न पित्र-कर्म का विधान है। पुराणोक्त पद्धति से निम्नांकित कर्म किए जाते हैं :-

एकोदिष्ट श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध
नाग बलि कर्म
नारायण बलि कर्म
त्रिपिण्डी श्राद्ध
महालय श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध कर्म

इसके अलावा प्रत्येक मांगलिक प्रसंग में भी पितरों की प्रसन्नता हेतु 'नांदी-श्राद्ध' कर्म किया जाता है। दैनंदिनी जीवन, देव-ऋषि-पित्र तर्पण किया जाता है।

उपरोक्त कर्मों हेतु विभिन्न संप्रदायों में विभिन्न प्रचलित परिपाटियाँ चली आ रही हैं। अपनी कुल-परंपरा के अनुसार पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए।

कैसे करें श्राद्ध कर्म
महालय श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त घर में क्या कर्म करना चाहिए। यह जिज्ञासा सहजतावश अनेक व्यक्तियों में रहती है।

यदि हम किसी भी तीर्थ स्थान, किसी भी पवित्र नदी, किसी भी पवित्र संगम पर नहीं जा पा रहे हैं तो निम्नांकित सरल एवं संक्षिप्त कर्म घर पर ही अवश्य कर लें :-

प्रतिदिन खीर (अर्थात्‌ दूध में पकाए हुए चावल में शकर एवं सुगंधित द्रव्य जैसे इलायची केशर मिलाकर तैयार की गई सामग्री को खीर कहते हैं) बनाकर तैयार कर लें।
गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित कर लें।
उक्त प्रज्वलित कंडे को शुद्ध स्थान में किसी बर्तन में रखकर, खीर से तीन आहुति दे दें।
इसके नजदीक (पास में ही) जल का भरा हुआ एक गिलास रख दें अथवा लोटा रख दें।
इस द्रव्य को अगले दिन किसी वृक्ष की जड़ में डाल दें।
भोजन में से सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते और कौए के लिए ग्रास अलग से निकालकर उन्हें खिला दें।
इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएँ फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें।
पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें।
गाय
काला कुत्ता
कौआ

श्राद्ध कब और कौन करे
माता-पिता की मरणतिथि के मध्याह्न काल में पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए।
जिस स्त्री के कोई पुत्र न हो, वह स्वयं ही अपने पति का श्राद्ध कर सकती है।
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श्राद्ध क्यों करें?
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-प्रस्तुति डॉ. मनस्वी श्री विद्यालंकार

एक वैज्ञानिक विवेचन
भारतीय सनातन परंपरा मानव जीवन में व्याप्त सर्वांगीण क्षेत्रों में अपने ज्ञान के उच्चस्थ शिखर से प्रखर होती है। मानव जीवन के छोटे-बड़े हर क्षेत्र से संबंधित क्रिया-कलाप, नीति निर्देशन आदि इसमें मौजूद हैं। हमारे शरीर को जो जीवन शक्ति संचालित करती है उसे 'आत्मा' कहते हैं। जिसके महाप्रयाण से शरीर निष्क्रिय होकर मृत कहलाता है वह आत्मा ही है।

शरीर को जीवनी शक्ति प्रदान करने वाला आत्मा जन्म के पूर्व जीवित रहते समय एवं मृत्यु के पश्चात्‌ किस अवस्था में रहता है। इन प्रत्येक अवस्था में उसकी स्थिति क्या रहती है, इसका विषद एवं गहनतम उल्लेख भारतीय शास्त्रों में अत्यंत विस्तार से उपलब्ध है।

आत्मा क्या है? इसका उत्तर बड़ी सरलता से हमें मिल जाएगा, क्योंकि उत्तर हमारे पास है ही।
हमारे शरीर में जीवन संचरण (शरीर को चलाने वाली) कोई शक्ति अदृश्य रूप से विद्यमान जरूर है। यह शक्ति प्रत्येक शरीर में कम अथवा अधिक समय तक विद्यमान रहती है। इसके रहते शरीर के अवयव अपना-अपना कार्य करते रहते हैं। इसके शरीर से निकल जाने के पश्चात्‌ शारीरिक अवयव विद्यमान तो जरूर रहते हैं, किंतु उनकी क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है। इसे मृत्यु कहते हैं। शरीर में क्रियाशीलता बनाए रखने का कार्य जिस तत्व से होता है वह 'आत्मा' कहलाता है।

यह तत्व शरीर के अस्तित्व में आने के पूर्व, अर्थात्‌ जन्म लेने के पूर्व, शरीर के क्रियाशील रहते अर्थात्‌ जीवित रहते, शरीर की क्रियाशीलता समाप्त होने के अर्थात्‌ मृत्यु के पश्चात्‌ क्या किसी स्थिति में रहता है? क्या शरीर में रहते ही उसका अस्तित्व है? अथवा कि शरीर धारण करने के पूर्व भी उसका अस्तित्व था? एवं क्या शरीर की मृत्यु के पश्चात भी उसका अस्तित्व किसी रूप में रहेगा? ये अतिगंभीर रूप से चिंतनीय विषय हैं।

हम यदि इस पर गंभीर विचार करें तो एक बात सरलता से हमारी समझ में आएगी कि शरीर के जीवित रहते जो तत्व इस शरीर को क्रियाशील रखता है वह तत्व शरीर के जन्म लेने के पूर्व, शरीर की मृत्यु के पश्चात अस्तित्वहीन हो जाए, ऐसा तो संभव नहीं है।

भारत के आर्ष ऋषियों ने अपने अतीन्द्रिय ज्ञान से इस प्रश्न के उत्तर को खोजकर शरीर के जन्म के पूर्व, शरीर के जीवित रहते, शरीर की मृत्यु के पश्चात्‌ इस तत्व अर्थात्‌ आत्मा की क्रियाशीलता व उसकी विभिन्न स्थितियों का विषद् चित्रण प्रस्तुत किया है।

हमारे मन में यह शंका उठ सकती है कि इन सब विवरणों पर यदि विश्वास कर भी लें तो हमारे पास उसे जानने, उसे मानने का वैज्ञानिक आधार क्या है?

हमारी शंका निर्मूल नहीं है? अकारण भी शंका नहीं है? यदि हम शंका न भी करें तो वैज्ञानिक आधार पर इन्हें जानने-समझने का सशक्त एवं विश्वसनीय कारण तो समझ में आना ही चाहिए।

यह विषय अतिगंभीर है। सूक्ष्मतम विवेचना, साथ ही समझने की हमारी सार्थक चेष्टा से ही हमें यह समझ आएगा।

मरने के पश्चात्‌ पुनर्जन्म होता है यह हमारी आध्यात्मिक धारणा हमें समझाई गई है। विश्व के अनेक देशों में हजारों प्रकरण प्रकाश में आए हैं, जिनमें अनेक व्यक्तियों ने अपने पूर्व जन्म के विवरण दिए हैं। इन विवरणों में अधिकांशतः न केवल सत्य पाए गए हैं, अपितु उनके सत्य होने के विपुल प्रमाण भी उपलब्ध हुए हैं।

हमारा एक आध्यात्मिक विश्वास है कि मरने के पश्चात्‌ मनुष्य भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, किन्नर आदि अनेक योनियों को प्राप्त करता है। विश्व में अनेक प्रकरणों में भूत-बाधा, प्रेत-बाधा इत्यादि अनेक विवरण प्रमाणित हुए हैं, किंतु ऐसे अधिकांश प्रकरण निर्मूल व निराधार भी निकले हैं। इसके पीछे कारण यह रहा कि अंधविश्वास, अज्ञान, निर्मूल शंका के आधार पर वे प्रकरण प्रस्तुत किए गए। अधिकांश प्रकरण विश्वासघात करने, अपने स्वार्थ की प्रतिपूर्ति करने, उद्देश्य प्राप्ति में भटकाव लाने, अपने अपराध पर आवरण (पर्दा) डालने, ध्यान परिवर्तित करने एवं किसी क्षुब्ध स्वार्थ की प्रतिपूर्ति करने के लिए मनगढ़ंत रूप से रचे गए।

उक्त वर्णित मनगढ़ंत प्रकरणों की सत्यता प्रकाशित होते ही हमारे अध्यात्म विज्ञान पर प्रश्न चिह्न लगाए जाते हैं। फिर भी यह तय है कि यदि हम निष्पक्ष रूप से गंभीर चिंतन-मनन करें, अपने ज्ञान को परिमार्जित कर सत्य का अन्वेषण करने की सार्थक चेष्टा करें तो, हमें यह मानने को बाध्य होना ही पड़ेगा कि जीवन के पूर्व एवं पश्चात्‌ आत्मा अस्तित्वहीन हो जाए, यह संभव नहीं है।

जन्म के पूर्व : हमारे आर्ष ऋषियों ने जन्म के पूर्व 'गर्भाधान संस्कार' प्रदान किया है। स्त्री और पुरुष के सहवास से ही संतान का जन्म संभव है। सहवास को यदि संस्कार के रूप में अध्यात्म विज्ञान में निर्देशित मानदंडों के आधार पर संतान प्राप्ति हेतु उपयोग किया जाए तो निश्चित रूप से योग्य, मेधावी एवं विलक्षण प्रतिभा युक्त संतान प्राप्त की जा सकती है। इसमें कोई संशय नहीं है।

जन्म से मृत्यु के मध्य :- जन्म से मृत्यु के बीच शरीर कि अनेक क्रिया-प्रक्रिया द्वारा 'आत्मा' को अतिचैतन्य, अतिप्रज्ञावान बनाया जा सकता है। इसके अनेक उदाहरण सदैव मौजूद रहे हैं।

आत्मा को बारंबार जन्म-मृत्यु के कष्ट से मुक्ति अर्थात्‌ मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य पर भी पहुँचाया जा सकता है। मोक्ष प्राप्ति के परिणामों की पुष्टि कर पाना संभव नहीं है, किंतु दिव्यत्व प्राप्ति के प्रमाण अवश्य मिलते हैं।

मृत्यु के पश्चात्‌ :- मृत्यु के पश्चात्‌ अनेक स्थितियों में से तीन स्थिति निम्नांकित रूप में वर्णित की गई हैं :-

अधोगति अर्थात्‌ भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, किन्नर आदि योनि को प्राप्त होना, मृत्यु लोक की प्राप्ति।
अर्ध्व गति अर्थात्‌ स्वर्ग लोक की प्राप्ति।
मोक्ष अर्थात्‌ ब्रह्म लोक की प्राप्ति।

उक्त तीनों स्थिति का प्रमाण अथवा साक्ष्य प्राप्त हो न हो, हम अपने स्वयं के ज्ञान के आधार पर इन स्थितियों के होने की संपूर्ण कल्पना अवश्य कर सकते हैं। हमारी कल्पना शक्ति जितनी भी सृजनशील एवं धनात्मक दृष्टिकोण से घनीभूत होगी, हमारा सद्विश्वास उतना ही समनुन्नत रूप से अपना आधार प्राप्त कर लेगा।

श्राद्ध क्यों? श्राद्ध क्या है?

उपरोक्त वर्णन से हमें ज्ञात हुआ कि 'आत्मा' की अधोगति प्राप्ति की स्थिति निकृष्ट स्थिति है, अतः इससे मुक्ति पाने का क्या कोई उपाय हो सकता है। इससे मुक्ति प्राप्ति हेतु अनेक उपाय धर्मशास्त्रों में वर्णित हैं। इनमें से अतिसरल एवं सहजता से करने योग्य उपाय है 'श्राद्ध कर्म'।

श्राद्ध कर्म क्या है?
श्रद्धावंत होकर अधोगति से मुक्ति प्राप्ति हेतु किया गया धार्मिक कृत्य- 'श्राद्ध' कहलाता है। भारतीय ऋषियों ने दिव्यानुसंधान करके उस अति अविशिष्ट काल खंड को भी खोज निकाला है जो इस कर्म हेतु विशिष्ट फलदायक है। इसे श्राद्ध पर्व कहते हैं। यह पक्ष आश्विन कृष्ण पक्ष अर्थात्‌ प्रतिपदा से अमावस्या तक का 15 दिवसीय पक्ष है। इस पक्ष में पूर्णिमा को जोड़ लेने से यह 16 दिवसीय महालय श्राद्ध पक्ष कहलाता है।

इस श्राद्ध पक्ष में हमारे परिवार के दिवंगत व्यक्तियों की अधोगति से मुक्ति प्राप्ति हेतु धार्मिक कृत्य किए जाते हैं। जो भी व्यक्ति जिस तिथि को भी किसी भी माह में मृत्यु को प्राप्त हुआ, इस पक्ष में उसी तिथि को मृतक की आत्मा की शांति हेतु धार्मिक कर्म किए जाते हैं। इस प्रकरण में भारतीय चाँद्र वर्ष अर्थात्‌ वर्तमान प्रचलित संवत्सर पद्धति की तिथि ली जाती है। आंग्ल सौर वर्ष आधारित दिनांक (घची) से इसकी गणना नहीं की जाती है।
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04 अप्रैल 2011

DOST YA PYAR


itni badi duniya me aapke dil ki baat ko sunne ke liye koun baitha hai,
agar aapke dil ki baat ko koi sun pata to sayad hi duniya me ye dil ke rog rahta, aur yahin se suru hoti hai dil ki bimari, dil ki baat agar dusre dil tak aap agar pahuncha sakte hain tabhi aap sarthak honge, :-

kisi ek aadmi ka 5 sal pahle koi ek mahila se dosti ho jati hai , fir dono me ghanist-ta badti hai, ve dono jab bhi samay milta phone par lambi lambi baten karte , dono me ghanistata pragarh ho gayee, dono ek dusre ko dil se chahne lage ,un dono me itni ghanist-ta ho gayee ki raat ko sone ke pahle ek dusre ko good-night kahna nahi bhulte,
achanak 4 mahina baad us mahilane us byakti se apne aapko alag kar liya , lekin us byaktine bar bar jan-na chaha uski kis galti ki itni badi use saja mil rahi hai, dono ne saath chalne ki vade kiye the to uska kya huaa? us byakti ne 2 sal tak jan-ne ki kosis karta raha ,ki use aisi saja kyon mila? isi tarah ek din use dilka rog ne use hospital tak pahuncha diya, lekin upar wale ki meharbani se wah wapas ghar lout kar aaya, aane ke baad bhi wah jan-ne ki kosis karta raha lekin uska jawab use abhi tak nahi mila,

sayad use iska jawab mil jaye, agar nahi milta hai to main hi us mahila se milkar puchenge aakhir kyon aapne aisa kiya , kyon aapne kisi se jhoothe wade kiye, kyon use tora, thik hai pyar to choro jo dosti ki kasme khai thi uska kya huaa? jindagi me pyar se bhi badakar dosti hoti hai uska hi kamse kam laaj rakh leti, dosti karna to bahut aasan hai mere dost use nibhana bahut kathin hota hai,

hamare sabhi doston se gujarish hai , agar vo dosti nibha na sake na sahi lekin kabhi dosti todna nahi mere dost, kyon ki ye ek jindagi ka anmol khajana hota hai mere dost,